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युगसङ्कल्पना तथा ब्राह्ममानम्

युगसङ्कल्पना तथा ब्राह्ममानम्   कालः मानवजीवनस्य अभिन्नाङ्गः वर्तते। भारतीयवाङ्मयस्य मुख्यं लक्ष्यं तावत् मोक्षं प्रति स्वात्मानं निवेशनम्। कृत्यकर्मविधातुं सम्पादयितुं कालस्य महती आवश्यकता भवति तदेव ज्योतिषशास्त्रस्य विषयः वर्तते।  वेदाहियज्ञार्थमभिप्रवृत्ताः कालानुपूर्वा विहिताश्च यज्ञाः। तस्मादिदं कालविधानशास्त्रं यो ज्योतिषं वेद स वेद यज्ञान्।। कालस्य अनेका घटकाः सन्ति। त्रुट्यादितः कल्पं यावत् नैकाः कालावयवाः भवन्ति। कालावयवास्तावत् त्रिशत्दिनानां एकः मासः। मासैद्वादशभिः वर्षं प्रदिष्टम्। 360 सौरवर्षैः दिव्यवर्षमेकम्। 12000 दिव्यवर्षैः एकं महायुगम्। 71 महायुगैः 1 मनुः। 14 मनुभिः 1 कल्पः। स एव कल्पः ब्रह्मणः अहः तथा च तावती एव तस्य रात्रिरपि।                                                                                    ...

नक्षत्र

  नक्षत्रः न क्षरति इति नक्षत्रम्॥ आकाश में तारों के समूह को नक्षत्र कहतें हैं। न क्षरति इति नक्षत्रम्॥ इस व्युत्पत्ति के अनुसार जो चलते नहीं अथवा स्थिर है वह नक्षत्र है। आकाश में दो प्रकार के पिण्ड दिखतें हैं। १ . स्थिर अर्थात जगह न बदलने वाले तेजोगोल , उनमें २७ नक्षत्र आते हैं। २ . अपनी जगह हर दिन बदलने वाले तेजोगोल वह ग्रह हैं। गृह्णा ति स : ग्रह : । ज् ‍ योतिष में सूक्ष् ‍ म फलकथन के लिए राशिचक्र के केवल १२ राशि की आवश्यकता नहीं हो ती । अपितु फलकथन के लिए कई और विभागों का जानना जरूरी है और उनमें से सबसे महत् ‍ वपूर्ण है नक्षत्र। यदि राशिचक्र को सत् ‍ ताईस बराबर भागों में बांटा जाए तो हर भाग एक नक्षत्र कहलाएगा। अंग्रेजी में नक्षत्र को कान् ‍ सटैलेशन ( constellation) या स् ‍ टार ( star) भी कहा जाता है। गणितीय दृष्टिकोण से राशिचक्र को ३६० अंश का होता है अत : हर एक नक्षत्र ३६० / २७ = १३ अंश २० कला का होता है। हर राशि कि तरह ही हर ...