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Showing posts from October, 2022

सूर्य का तुला राशि में गोचर सूर्य ग्रहण का १२ राशियों पर प्रभाव

  अनुशासन व स्वाभिमान के ग्रह , ग्रहों के राजा सूर्य व्यापार व व्यवहार की राशि तुला में जा रहे हैं । अक्टूबर २०२२ में अपनी नीच राशि तुला में जा रहे हैं , यहां उनका सूर्य ग्रहण भी होगा। इसका आप पर अर्थात १२ राशि पर क्या प्रभाव होगा हम इस लेख के माध्यम से विस्तार से जानेंगे।             सूर्य तुला राशि में १७ अक्टूबर २०२२ से १६ नवंबर २०२२ तक रहेंगे , उसी बीच २५ अक्टूबर २०२२ को शाम ४ : ३० से ५ : ४० मिनट तक भारत में सूर्य ग्रहण रहेगा। विश्व के लिये यह समय लगभग दोप २ : ३० से ६ : ३० तक रहेगा।             इस सूर्य ग्रहण का किस पर अधिक प्रभाव होगा यह हम जानने का प्रयत्न करेंगे – सूर्य सरकार व अधिकार के कारक होते हैं और तुला राशि व्यापार – व्यवसाय की राशि होती है। इस राशि परिवर्तन से सरकारी कर्मचारी से लेकर साधारण व्यापारी तक सभी प्रभावी होने वाले हैं और ग्रहण से भी प्रभावित होने वाले हैं। फिर भी जिन लोगों की सूर्य और शुक्र की दशा चल रही है उन पर इसका अधिक प्रभाव होगा। तुला र...

राजधर्मविचार - लेखमाला - पुष्प २रे

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  राजधर्मविचार : पुष्प २रे - श्री. आशिष अनिल आठवले समन्वयक ,  क.का.सं.वि., रत्नागिरी उपकेंद्र 8600526882 aashisha @ kksu . org               प्रजेच्या रक्षणासाठी आणि हितासाठी परमेश्वराने इंद्र , वायू , यम , सूर्य , अग्नी, वरुण, चंद्रमा आणि कुबेर यांचे अंश घेऊन राजाची निर्मिती केली असे सांगितले आहे. म्हणूनच प्रजापालन आणि प्रजारक्षण हे राजाचे आद्य कर्तव्य बनते. आता या देवतांचे अंश घेऊन राजाची निर्मिती केली म्हणजे काय असा प्रश्न उपस्थित झाला असता हे लक्षात घ्यावे की इंद्र हे सार्वभौमत्वाचे प्रतीक, वायू वेगाचे , यम कठोरतेचे , सूर्य प्रखरतेचे, अग्नी तेजस्वितेचे , वरुण सौहार्दाचे, चंद्रमा शांततेचे तर कुबेर हे वैभवाचे प्रतीक आहे. राजा यांनी बनलेला असतो म्हणजे या गुणांनी संपन्न असतो. कारण राजाला वेळोवेळी हे गुण उपयोगी पडत असतात. आपल्या गुणातिशयाने तो योग्य वेळी योग्य वर्तन करतो. सोऽग्निर्भवति वायुश्च सोऽर्कः सोमः स धर्मराट् । स कुबेरः स वरुणः स महेन्द्रः प्रभावतः ।।        ...

दीपावली पर्व पर महालक्ष्मी पूजन का महत्व

  कार्तिक कृष्ण अमावस्या को समुद्र मंथन के परिणामस्वरूप महालक्ष्मी का जन्म हुआ था। ज्योतिषशास्त्र , भूगोल अथवा खगोल की दृष्टि से देखें तो सूर्य को सभी ग्रहों का केन्द्र एवं राजा माना गया है। सूर्य की बारह संक्रांतियां होती है। नाडीवृत्त मध्य में होता है , तीन क्रांतिवृत्त उत्तर को और तीन दक्षिण को होते हैं। सूर्य क्रांतिवृत्त पर विचरण करता है। यह ६ माह उत्तर गोल एवं ६ माह दक्षिण गोल में विचरण करता है , जिन्हें देवभाग व राक्षस भाग भी कहते हैं।             मेष एवं तुला की संक्रान्ति में सूर्य विषुवत रेखा ( नाडीवृत्त ) पर रहता है , जिसे देवता ६ माह तक उत्तर की ओर तथा राक्षस ६ माह तक दक्षिण की ओर खींचते हैं। मंदराचल पर्वत ही नाडीवृत्त है , जिसके एक भाग में मेष , वृषभ , मिथुन , कर्क , सिंह व कन्या राशि हैं जिन्हें देवता खींचते हैं। दूसरे भाग में तुला , वृश्चिक , धनु , मकर , कुंभ व मीन राशि हैं जिन्हें राक्षस खींचते हैं। मंथन से चौदह रत्न निकलते हैं , जिसमें महालक्ष्मी कार्तिक की अमावस्या को प्रकट होती है।    ...

तंत्रयुक्ति

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  कु. भार्गव लक्ष्मण वळंजू  प्रकल्प साहाय्यक  क.का.सं.वि. रत्नागिरी उपकेंद्र                          तंत्रयुक्ति ही एक अर्थज्ञान पद्धती आहे, जी प्रामुख्याने आयुर्वेदात वापरली जाते. आयुर्वेद हा वैदिक साहित्याचा भाग असल्याने, मीमांसा, न्याय, व्याकरण हे अर्थ समजून घेण्यासाठी महत्त्वाचे आहेतच, परंतु आयुर्वेद शास्त्राने यासाठी एक स्वतंत्र आणि वैशिष्ट्यपूर्ण पद्धती विकसित केली, तंत्रयुक्ति. तन्त्र म्हणजे आयुर्वेदशास्त्र विषयक ग्रंथ होय. जसे , अग्निवेशतंत्र म्हणजे चरकसंहिता      सौश्रुततंत्र म्हणजे सुश्रुतसंहिता                             शास्त्रकारांना तंत्रयुक्ति चे दोन संकेत अभिप्रेत आहेत. 1.     तंत्रकारांनी स्वीकारलेले विशिष्ट लेखन संकेत. 2.     या संकेतांचा विचार करून तंत्राभिप्राय विषद करण्याची पद्धत. सुश्रुत ३२ तंत्रयुक्ति मान्य करतात तर चरक ...

राजधर्मविचार - लेखमाला - पुष्प १ले

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  राजधर्मविचार