दीपावली पर्व पर महालक्ष्मी पूजन का महत्व
कार्तिक कृष्ण अमावस्या
को समुद्र मंथन के परिणामस्वरूप महालक्ष्मी का जन्म हुआ था। ज्योतिषशास्त्र, भूगोल अथवा खगोल की दृष्टि से देखें तो सूर्य
को सभी ग्रहों का केन्द्र एवं राजा माना गया है। सूर्य की बारह संक्रांतियां होती है।
नाडीवृत्त मध्य में होता है, तीन
क्रांतिवृत्त उत्तर को और तीन दक्षिण को होते हैं। सूर्य क्रांतिवृत्त पर विचरण करता
है। यह ६ माह उत्तर गोल एवं ६ माह दक्षिण गोल में विचरण करता है, जिन्हें देवभाग व राक्षस भाग भी कहते हैं।
मेष
एवं तुला की संक्रान्ति में सूर्य विषुवत रेखा
(नाडीवृत्त) पर रहता है, जिसे
देवता ६ माह तक उत्तर की ओर तथा राक्षस ६ माह तक दक्षिण की ओर खींचते हैं। मंदराचल
पर्वत ही नाडीवृत्त है, जिसके
एक भाग में मेष, वृषभ, मिथुन,
कर्क, सिंह
व कन्या राशि हैं जिन्हें देवता खींचते हैं। दूसरे भाग में तुला, वृश्चिक,
धनु, मकर, कुंभ व मीन राशि हैं जिन्हें राक्षस खींचते
हैं। मंथन से चौदह रत्न निकलते हैं, जिसमें
महालक्ष्मी कार्तिक की अमावस्या को प्रकट होती है।
लक्ष्मी, महालक्ष्मी,
राजलक्ष्मी, गृहलक्ष्मी आदि लक्ष्मी के अनेक रूप हैं। लक्ष्मी विहीन होने पर लोग ज्योतिष
की शरण में भी जाते हैं। दीपावली के लिये पुराणों में अनेक कथाएं हैं। वास्तव में कार्तिक
कृष्ण अमावस्या को पृथ्वी का जन्म हुआ था और पृथ्वी ही महालक्ष्मी के रूप में विष्णु
की पत्नी मानी गई है। दीपावली पृथ्वी का जन्मदिन है,
इसलिए इस दिन सफाई करके धूमावती नामक दरिद्रा को कूडे-करकट के रूप में घर से बाहर निकालकर सब ओर
ज्योति जलाते है तथा श्री कमला लक्ष्मी का आव्हान करते हैं।
दीपावली
इस वर्ष अक्टूबर २०२२ में यह उत्सव मनाया जा रहा है। २१ अक्टूबर २०२२ से ही शुभ योगों
का प्रारम्भ हो रहा है, इस
दिन शुक्रवार, एकादशी तिथि ५:२५ शाम तक् उसके बाद द्वादशी तिथि है, १२:३०मिनट से पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र एवं शाम ५:५६ मिनट तक शुक्ल योग है, इसमें
प्रॉपर्टी में निवेश कर सकते हैं। २२ अक्टूबर २०२२ को धनतेरस पर अत्यंत शुभ त्रिपुष्कर
योग बन रहा है, क्योंकि इस दिन् शनिवार, द्वादशी तिथि ०६:०५ मिनट तक, एवं
उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र दोपहर १:१:५२ मिनट से प्रारम्भ हो रहा है, अर्थात लगभग दोपहर १:१:५२ मिनट से शाम ०६:०५
मिनट तक यह त्रिपुष्कर योग रहेगा जिसमें कोई शुभ कार्य करने से उसका त्रिगुणित फल प्राप्त
होता है। इस योग में हर तरह की खरेदारी की जा सकती है। २३ अक्टूबर २०२२ को छोटी दिवाली
पर सर्वार्थसिद्धि योग है, तथा
चन्द्र एवं गुरु की समसप्तक युति भी शुभ है,
जिसमें वस्त्र, अलंकार, वाहन ई की खरीदारी
शुभ होगी। २४ अक्टूबर को दिवाली है, हस्त
नक्षत्र दोपहर २:४०
मिनट तक तदनन्तर चित्रा नक्षत्र होगा। दिवाली पूजन के लिए शुभ मुहूर्त शाम ६ बजकर ५४
मिनट से ८ बजकर १६ मिनट तक है। २५ अक्टूबर २०२२ को गोवर्धन पूजा सूर्यग्रहण से प्रभावित
होगी, २६ अक्टूबर को भाईदूज
होगी। छठ पूजा दिवाली के ६ दिन बाद ३० अक्टूबर २०२२ को प्रारम्भ होगी जो बडे ही धूमधाम
के साथ ४ दिनों तक मनाई जाएगी। इस व्रत में भगवान सूर्य की विधिवत पूजा की जाती है।
दीपावली
से पूर्व अच्छी वर्षा से धनधान्य की समृध्दि रूपी लक्ष्मी का आगमन भी होता है। ज्योतिषशास्त्र
में भी जन्मकालीन ग्रहयोगों के आधार पर महालक्ष्मी योग देखा जाता है। यह योग श्री लक्ष्मी
प्राप्ति का संकेत देता है। केन्द्रस्थान लग्न,
चतुर्थ, सप्तम
एवं दशम यह विष्णुस्थान है, तथा
त्रिकोण स्थान पंचम एवं नवम होते हैं जो लक्ष्मीस्थान कहलाते
हैं। त्रिकॊण स्थान एवं केन्द्र
स्थान के संबंध से कुण्डली में विविध राजयोग उत्पन्न होतें हैं जिससे व्यक्ति अनेक
सुखोपभोग करता है। जिस व्यक्ति का शरीर स्वस्थ हो, स्थायी संपत्ति,
सुख-सुविधा
के साधन हों, जीवनसाथी मनोनुकूल
हो तो वह विष्णुस्वरूप बन जाता है। इन सब गुणों का उपयोग सद्बुद्धि एवं धर्मपरायणता
के साथ हो तो व्यक्ति महालक्ष्मी एवं राज्यश्री को प्राप्त करने वाला होता है। व्यक्ति
यदि कर्मशील होगा, सदाचारी
होगा, गुरुनिंदा, चोरी,
हिंसा आदि दुराचारों से दूर रहेगा तो लक्ष्मी स्वत: उसके यहां स्थान बना लेगी।
कर्मशील
एवं सदाचारी व्यक्ति को ही राज्यश्री एवं महालक्ष्मी योग बन पाता है। आम जनता में ऎसी
धारणा है कि खूबसारा पैसा, धन
दौलत हो तो आनंद की प्राप्ति हो सकती है, परंतु यह धारणा गलत है। ज्योतिषशास्त्र एवं पौराणिक ग्रंथों में महालक्ष्मी
का स्वरूप मुद्रा में नहीं बताया गया है।
लक्ष्मीवान
उस व्यक्ति को माना गया है जिसका शरीर स्वस्थ रहे और जिसे जीवन के हर पडाव पर प्रसन्नता
के भाव मिलते रहें। मुद्रा के स्थान एवं खर्च के स्थान को महालक्ष्मीयोग का कारक नहीं
माना गया है बल्कि प्राप्त मुद्रारूपी लक्ष्मी को सद्बुद्धि के साथ कैसे खर्च करके
आनंद लिया जाए इसे माना जाता है। इसलिए महालक्ष्मी पूजन में महालक्ष्मी,
महासरस्वती एवं गणेशजी का पूजन एक साथ किया जाता है।
गणेश
बुद्धि के देवता है तथा सरस्वती ज्ञान की देवी हैं,
इसीलिए लक्ष्मी के पहले
‘श्री’ शब्द
लगाया जाता है। यह श्री सरस्वती का बोधक है। इसका भाव यह होता है कि मुद्रारूपी लक्ष्मी
को भी यदि कोई प्राप्त करता है तो श्रेष्ठ गति के साथ उसका उपयोग एवं उपभोग करता है, वह आनंद की अनुभूति करता है।
ईशान्य कोण में हो लक्ष्मी
पूजन का स्थान :-
अनेक दीपकों से लक्ष्मीजी की आरती करने को दीपावली कहते हैं।
धन-वैभव और सौभाग्य प्राप्ति
के लिए दीपावली की रात्रि को लक्ष्मी पूजन के लिए श्रेष्ठ माना गया है। श्रीमहालक्ष्मी
पूजन, मंत्रजाप, पाठ,
तंत्रादि साधन के लिए प्रदोष,
निशीथ , महानिशीथकाल व साधनाकाल अनुष्ठानानुसार अलग-अलग महत्व रखते हैं। पूजा के लिए पूजास्थल तैयार करते समय दिशाओं का भी उचित
समन्वय रखना जरूरी है।
पूजा का स्थान ईशान्य कोण (उत्तर-पूर्व दिशा) की ओर बनाना शुभ है। इस दिशा के स्वामी भगवान शिव हैं, जो ज्ञान एवं विद्या के अधिष्ठाता हैं। पूजा स्थल उत्तर या पूर्व की ओर भी बनाया जा सकता है। पूजा स्थल को सफेद या हल्के पीले रंग से रंगे, ये रंग शांति, पवित्रता और आध्यात्मिक प्रगति के प्रतीक हैं। दीपावली में दक्षिणावर्ती शंख का विशेष महत्व है। इस शंख को विजय, सुख-समृद्धि, व लक्ष्मी का साक्षात प्रतीक माना गया है। दक्षिणावर्ती शंख को पूजा में इस प्रकार रखें कि उसकी पूंछ उत्तर-पूर्व दिशा की ओर रहे। श्रीयंत्र लक्ष्मीजी का प्रिय है। इसकी स्थापना उत्तर-पूर्व दिशा में करनी चाहिए। लक्ष्मी जी के मंत्रों का जाप स्फटिक या कमलगट्टे की माला से किया जाता है। इसका स्थान पूजास्थल के उत्तर की ओर होना चाहिए। दीपावली के दिन श्रीलक्ष्मी पूजन के पश्चात श्रीकनकधारा स्त्रोत का पाठ किया जाए तो घर की नकारात्मक ऊर्जा का नाश हो जाने से सुख-समृद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है।
२२ अक्ट्बर २०२२
डॉ. अंबालिका श्री. सेठिया
सहायक प्राध्यापक
वेदांग ज्योतिष विभाग
क.का. सं. वि. रामटे
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