वास्तुशास्त्र में प्रतिमा-मूर्ति कला विज्ञान

   वास्तुशास्त्र में प्रतिमा-मूर्ति कला विज्ञान   

                                                           

                                                           डॉ . दिनकर मराठे 

       सहयोगी प्राध्यापक तथा विभाग प्रमुख , वेदांग  ज्योतिष  विभाग 

संचालक, भारतरत्न  डॉ . पां.वा. काणे संस्कृत अध्ययन केंद्र 

रत्नागिरी  उपकेंद्र , क. का . सं . वि . रामटेक  



भारतीय वास्तुशास्त्र केवल भवन-निर्माण की तकनीक नहीं, अपितु एक समग्र दर्शन है, जिसमें देवालय, देवमूर्ति, मंदिर योजना, प्रतिष्ठा, संकल्पना तथा निर्माण से संबंधित सूक्ष्म विवरण प्राप्त होते हैं। विशेषकर, देवप्रतिमाओं का निर्माण केवल कला का विषय नहीं, अपि तु  धार्मिक और ब्रह्मांडीय तत्वों की अभिव्यक्ति है।

वास्तुशास्त्र, शिल्पशास्त्र, पुराण, तथा मयमतम्, अपराजितपृच्छा, बृहत्संहिता जैसे ग्रंथों में मूर्तिकला से संबंधित अनेक नियम वर्णित हैं — जैसे शिला का चयन, प्रतिमा का आकार, आयाम, लक्षण, दोष, प्रतिष्ठा विधि तथा विसर्जन आदि। शास्त्रों के अनुसार मूर्तियाँ निम्नलिखित सामग्रियों से बनाना शुभ माना गया है

  • अष्टधातु (सोना, चाँदी, ताँबा आदि आठ धातुओं का मिश्रण)
  • श्रेष्ठ रत्न
  • नीम आदि पवित्र वृक्षों की लकड़ी
  • प्रवाल, मोती जैसे समुद्रजन्य पदार्थ
  • तथा उपयुक्त प्रकार की शिला

काश्यप शिल्प एवं देवतामूर्ति प्रकरणम् के अनुसार, प्रतिमा हेतु शिला का संग्रह मुहूर्त में किया जाना चाहिए। शुभ नक्षत्र, वार, तिथि, योग एवं लग्न का विचार आवश्यक है।

 शिलाएँ उनके गुणों के आधार पर तीन प्रकार की मानी गई हैं:

  • पुरुष शिला: एकवर्णी, घनी, स्निग्ध, गंभीर ध्वनि वाली; देवताओं की मूर्तियों हेतु उपयुक्त।
  • स्त्री शिला: मुलायम, मोटी जड़ वाली, शोभायुक्त, मधुर ध्वनि वाली; देवियों के लिए।
  • अन्य शिला: खोखली, रेखायुक्त, ध्वनिहीन; वास्तु, कुएँ, भित्तियाँ आदि के लिए।

शास्त्रों में यह भी निर्देश है कि खण्डित, विवर्ण, दरारयुक्त, रेखायुक्त, रेतीली या खोखली शिला का उपयोग वर्जित है । प्रत्येक देवता का विशिष्ट स्वरूप, अंगविन्यास और आयुध होते हैं, जिनका वर्णन विभिन्न शिल्पशास्त्रों में मिलता है। ये केवल अलंकरण या सौंदर्य के दृष्टिकोण से नहीं, अपितु तत्वदर्शन एवं आध्यात्मिक संकल्पनाओं की  प्रतिकात्मकता हैं।

गणेश: गजानन, एकदन्त, चार भुजाएँ - दाहिने हाथों में अंकुश व स्वदन्त, बाएँ हाथ में लड्डू और अक्षसूत्र; पद्मासन पर विराजमान।

सूर्य: सात घोड़ों वाले रथ पर आरूढ़, दो हाथों में कमल, तेजयुक्त प्रभामंडल से घिरा ।

विष्णु: चार भुजाएँ, शंख, चक्र, गदा, पद्म धारक, पीताम्बरधारी, गले में कौस्तुभ, लक्ष्मी सहित ।

सरस्वती: श्वेत वर्ण, चार भुजाएँ, पुस्तक, जलपात्र, रुद्राक्षमाला, रत्नाभूषणयुक्त, श्वेत पद्म पर आसीन ।

दुर्गा: चार या आठ भुजाओं वाली, शंख, चक्र, गदा, खड्ग आदि अस्त्रों से युक्त, कमलासन पर ।

शिवलिंग: त्रैखंडीय — मूल में चतुरस्र, मध्य में अष्टकोण, ऊपर वृत्ताकार। पिण्डिका की ऊँचाई एवं व्यास लिंग के दृश्य भाग के अनुसार निश्चित होती है ।

 

बृहत्संहिता के अनुसार, मूर्ति की ऊँचाई का निर्धारण मंदिर के गर्भगृह द्वार की ऊँचाई से होता है ।

मूर्ति की ऊँचाई = (द्वार की ऊँचाई – 1/8) × 2

उदाहरणस्वरूप, यदि द्वार की ऊँचाई 84 इंच (7 फीट) है, तो मूर्ति की ऊँचाई लगभग 49 इंच (4 फीट 1 इंच) होगी ।

प्रतिमाओं की स्थापना आठों दिशाओं में की जा सकती है, किंतु दिशाओं का देवता एवं वास्तु के अनुसार विचार करना आवश्यक है ।

अपराजितपृच्छा के अनुसार, यदि प्रतिमा के प्रमुख अंग जैसे भुजा, मस्तक, चरण आदि खंडित हो जाएँ, तो उसे विसर्जित कर नई मूर्ति स्थापित करनी चाहिए। परंतु यदि केवल अलंकरण, नख, केश आदि खण्डित हो, तो वह त्याज्य नहीं मानी जाती।

यदि कोई प्रतिमा किसी सिद्ध साधक या महापुरुष द्वारा प्रतिष्ठित हो तथा उसका पूजन सौ वर्षों से अधिक समय तक चला हो, तो खंडित होने पर भी वह  त्याज्य  नहीं होती।

 (1) जगन्नाथ मंदिर, पुरी

यहाँ की मूर्तियाँ नीम की लकड़ी से बनती हैं। हर १२ से १९ वर्षों में ‘नवकलेवरनामक प्रक्रिया द्वारा पुरानी मूर्तियों का विसर्जन और नई मूर्तियों की प्रतिष्ठा की जाती है।

(2) अयोध्या के रामलला की प्रतिमा

वर्ष 2024 में प्रतिष्ठित यह मूर्ति कर्नाटक से प्राप्त कृष्ण शिला से निर्मित है। प्रसिद्ध मूर्तिकार अरुण योगीराज द्वारा छह माह में  यह मूर्ति निर्मित  है  । यह शिला वर्षों तक अम्ल, जल आदि से अप्रभावित रहती है।

वास्तुशास्त्र में प्रतिमा निर्माण केवल स्थापत्य कला का अंग नहीं, अपितु धर्म, दर्शन और ज्योतिष के समन्वय से निर्मित एक जीवंत परंपरा है। इन परंपराओं का समकालीन अनुप्रयोग भी दर्शाता है कि भारतीय संस्कृति में शास्त्र और व्यवहार का सामंजस्य आज भी प्रासंगिक एवं प्रभावकारी है।

 

संदर्भ:

1.     मयमतम् — अध्याय 36

2.     देवतामूर्तिप्रकरणम् – 1.10–1.23

3.     बृहत्संहिता – अध्याय 57

4.     अपराजितपृच्छा – सूत्र 215

5.     काश्यपशिल्प – 49.18

6.     अग्निपुराण – 43.11–12

7.     इंडियन एक्सप्रेस – जनवरी 2024, रामलला मूर्ति समाचार

8.     ओडिशा रिव्यू – जुलाई 2015, नवकलेवर पर विशेषांक


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