नक्षत्र
नक्षत्रः
न क्षरति इति नक्षत्रम्॥ आकाश में तारों के समूह को नक्षत्र कहतें हैं। न क्षरति इति नक्षत्रम्॥ इस व्युत्पत्ति के अनुसार जो चलते नहीं अथवा स्थिर है वह नक्षत्र है।
आकाश में दो प्रकार के पिण्ड दिखतें हैं।
१. स्थिर अर्थात जगह न बदलने वाले तेजोगोल, उनमें २७ नक्षत्र आते हैं।
२. अपनी जगह हर दिन बदलने वाले तेजोगोल वह ग्रह हैं। गृह्णाति स: ग्रह:।
ज्योतिष में सूक्ष्म फलकथन के लिए राशिचक्र के केवल १२ राशि की आवश्यकता नहीं होती। अपितु फलकथन के लिए कई और विभागों का जानना जरूरी है और उनमें से सबसे महत्वपूर्ण है नक्षत्र। यदि राशिचक्र को सत्ताईस बराबर भागों में बांटा जाए तो हर भाग एक नक्षत्र कहलाएगा। अंग्रेजी में नक्षत्र को कान्सटैलेशन (constellation) या स्टार (star) भी कहा जाता है। गणितीय दृष्टिकोण से राशिचक्र को ३६० अंश का होता है अत: हर एक नक्षत्र ३६० / २७ = १३ अंश २० कला का होता है। हर राशि कि तरह ही हर नक्षत्र का भी एक नाम होता है। पहले नक्षत्र का नाम अश्विनी, दूसरे का भरणी और आखिरी नक्षत्र का नाम रेवती है।
प्रत्येक नक्षत्र के ४ भाग होते हैं। उसे भपाद (भ = नक्षत्र) कहतें हैं। सव्वा दो नक्षत्र की एक राशि होती है। प्रत्येक राशि ३० अंश की होती है।
हर नक्षत्र का स्वामी ग्रह निश्चित है और वह इस क्रम में होता है - केतु, शुक्र, सूर्य, चंद्र, मंगल, राहु, गुरु, शनि और बुध। याद रखने में आसानी के लिए यह सूत्र याद रखें - केशुआचभौरराजीश यानि केतु, शुक्र, आदित्य (सूर्य), चंद्र, भौम (मंगल), राहु, जीव (गुरु), शनि, बुध । हर नवें नक्षत्र के बाद नक्षत्र स्वामी पुन: वही होता है अर्थात् कि जो पहले नक्षत्र का स्वामी ग्रह है वही दसवें नक्षत्र का स्वामी होता है और वही १९वें नक्षत्र का स्वामी होगा।
नक्षत्र नाम
अश्विनी भरणी चैव कृत्तिका रोहिणी मृगः।
आर्द्रा पुनर्वसुः पुष्य आश्लेषा च ततो मघा ॥
पूर्वाफाल्गुनिका ज्ञेया तत उत्तरफल्गुनी ।
हस्तश्चित्रा ततः स्वाती विशाखा मैत्रभं ततः ॥
ज्येष्ठा मूलं ततःपूर्वोत्तराषाढाऽभिजित्ततः ।
श्रवणाश्च धनिष्ठा च ततश्च शततारका ॥
पूर्वोत्तराभाद्रपदे रेवती तदनन्तरम् ।
अष्टाविंशतिराख्यातास्तारका मुनिसत्तमैः ॥
(बालबोधज्यौतिषम्. अ.१, श्लो.३९-४२)
१.
अश्विनी, २. भरणी, ३. कृत्तिका, ४. रोहिणी, ५. मृगशीर्ष, ६. आर्द्रा, ७. पुनर्वसु, ८. पुष्य, ९. आश्लेषा, १०. मघा, ११. पूर्वाफाल्गुनी, १२. उत्तराफाल्गुनी, १३. हस्त, १४. चित्रा, १५. स्वाति, १६. विशाखा, १७. अनुराधा, १८. ज्येष्ठा, १९. मूल, २०. पूर्वाषाढा, २१. उत्तराषाढा, २२. अभिजित् २३. श्रवण, २४. धनिष्ठा, २५. शतभिषा, २६. पूर्वाभाद्रपदा, २७. उत्तराभाद्रपद, २८. रेवती ये अट्ठाईस नक्षत्र हैं। (अभिजित् को छोड़कर, नक्षत्र संख्या २७ होती है।)
नक्षत्रपाद मे राशि
विचार
अश्विनी
भरणी कृत्तिका पादमेकं मेषः।
कृत्तिकायास्त्रयः
पादा रोहिणी मृगशीर्द्धं वृषभः।
मृगशीर्द्धमार्द्रा
पुनर्वसुपादत्रयं मिथुनः।
पुनर्वसुपादमेकं
पुष्याश्लेषान्तं कर्कः।
मघा
च पूर्वाफाल्गुननि उत्तराफाल्गुननि पादमेकं सिंहः।
उत्तराफाल्गुन्यास्त्रयः
पादा हस्ताश्चित्रार्द्धं कन्या।
चित्रार्द्धं
स्वाति विशाखापादत्रयं तुला ।
विशाखापादमेकमनुराधा
ज्येष्ठान्तं वृश्चिकः।
मूलं
च पूर्वाषाढोत्तराषाढापादमेकं धनुः।
उत्तरास्त्रयः
पादाः श्रवणं धनिष्ठार्द्ध मकरः।
धनिष्ठार्द्धं
शतभिषापूर्वाभाद्रपदा पादत्रयं कुम्भः।
पूर्वाभाद्रपदा
पादमेकमुत्तराभाद्रपदा रेवत्यन्तं मीनः॥ (बालबोधज्योतिषसारसमुच्चयः.1.38)
|
मीनः पूर्वाभाद्रपद 4 उत्तराभाद्रपद 1, 2, 3, 4 रेवती 1, 2, 3, 4 |
मेषः अश्विनी 1,
2, 3, 4 भरणी 1,
2, 3, 4 कृत्तिका 1 |
वृषभः कृत्तिका 2,
3, 4 रोहिणी 1,
2, 3, 4 मृगशीर्ष 1, 2 |
मिथुनः मृगशीर्ष 3, 4 आर्द्रा 1,
2, 3, 4 पुनर्वसु 1,
2, 3 |
|
कुमभः धनिष्ठा 3, 4 शतभिषा 1,
2, 3, 4 पूर्वाभाद्रपद 1, 2, 3 |
नक्षत्रों
का समूह और राशियाँ |
कर्कः पुनर्वसु 4 पुष्या 1,
2, 3, 4 आश्लेषा 1, 2, 3, 4 |
|
|
मकरः उत्तराषाढा 2, 3, 4 श्रवण 1, 2, 3, 4 धनिष्ठा 1,
2 |
सिंहः मघा 1, 2, 3, 4 पू.फाल्गुननि 1, 2, 3, 4
उ.फाल्गुननि 1 |
||
|
धनुः मूला 1, 2, 3, 4 पूर्वाषाढा 1,
2, 3, 4 उत्तराषाढा 1 |
वृश्चिकः विशाखा 4 अनुराधा 1,
2, 3, 4 ज्येष्ठा 1, 2, 3, 4 |
तुला चित्रा 3, 4 स्वाति 1, 2, 3, 4 विशाखा 1,
2, 3 |
कन्या उ.फाल्गुननि 2, 3, 4 हस्ता 1, 2, 3, 4 चित्रा 1, 2 |
अभिजिद्योग विचार
वैश्वभस्यान्तिमः
पादः कर्णस्य तिथिः भागयुक्,
अभिजित
नाम नक्षत्रं शुभमेतत्सुकर्मसु । (ज्योतिस्तत्व.24)
उत्तराषाढा नक्षत्र का चौथा पाद और श्रवण नक्षत्र की प्रथम चार घटिकाए अभिजित् नक्षत्र का भोगकाल होता है। इसलिये उसे अट्ठाईस नक्षत्रों में गिना गया है। उत्तराषाढा नक्षत्र की अंतिम १५ घटी और श्रवण नक्षत्र की पहली ४ घटी = १९ घटी होती है अत: अभिजित् नक्षत्र १९ घटी का है।
अभिजित् नक्षत्र आकाश में २७६ अंश ४० कला से २८० अंश ५३ कला तक है अर्थात इसका कुल क्षेत्र ४ अंश १३ कला है।
नक्षत्र स्वामि ज्ञान
नक्षत्रेशाः क्रमाद्दस्रयमवह्नि पितामहाः ।
चन्द्रेशादितिजीवाहिपितरो भगसंज्ञिताः ॥
अर्यमार्कस्त्वष्ट्रमरुच्छक्राग्निमित्रवीसवाः ।
निऋत्युदकविश्वेजगोविन्दवसवोऽम्बुपः ॥
ततोऽजपादहिर्बुध्न्यः पूषा चेति प्रकीर्तिताः ।
|
नक्षत्र-स्वामिः |
|||||||||
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नक्षत्रः |
अश्विनी |
भरणी |
कृत्तिका |
रोहिणी |
मृगशीर्ष |
आर्द्रा |
पुनर्वसु |
पुष्या |
आश्लेषा |
|
स्वामिः |
अश्विनीकुमारः |
यमः |
अग्निः |
ब्रह्मा |
चन्द्रः |
शिवः |
अदिति |
बृहस्पतिः |
सर्पः |
|
नक्षत्रः |
मघा |
पूर्वाफाल्गुननि |
उत्तराफाल्गुननि |
हस्ता |
चित्रा |
स्वाति |
विशाखा |
अनुराधा |
ज्येष्ठा |
|
स्वामिः |
पितृदेवः |
भगदेवः |
अर्यमा |
सूर्यः |
विश्वकर्मा |
वायुः |
इन्द्राग्नौ |
मित्र |
इन्द्रः |
|
नक्षत्रः |
मूला |
पूर्वाषाढा |
उत्तराषाढा |
श्रवण |
धनिष्ठा |
शतभिषा |
पूर्वाभाद्रपद |
उत्तराभाद्रपद |
रेवती |
|
स्वामिः |
राक्षसः |
जल |
विश्वेदेवा |
विष्णुः |
वसुः |
वरुण |
अजचरण |
अहिर्बुध्न्य |
पूषा |
(बालबोधज्यौतिषम्.
अ.१, श्लो.४३-४५)
१. अश्विनी का स्वामी अश्विनीकुमार, २. भरणी का यम, ३. कृत्तिका का अग्नि, ४. रोहिणी का ब्रह्मा, ५. मृगशीर्ष का चन्द्रमा, ६.
आर्द्रा का शिव, ७. पुनर्वसु का अदिति, ८. पुष्य का बृहस्पति, ९. आश्लेषा का सर्प, १०. मघा का पितृदेव, ११. पूर्वाफाल्गुनी का भगदेव, १२. उत्तराफाल्गुनी का अर्यमा, १३. हस्त का सूर्य, १४. चित्रा का त्वष्टा (विश्वकर्मा), १५. स्वाति का वायु, १६.
विशाखा का इन्द्र और अग्नि १७. अनुराधा का मित्र, १८. ज्येष्ठा का इन्द्र, १९. मूल का निऋति (राक्षस), २०. पूर्वाषाढा का जल, २१. उत्तराषाढा का विश्वेदेव, २२. अभिजित् का ब्रह्मा, २३. श्रवण का विष्णु, २४. धनिष्ठा का वसु, २५. शतभिषा का वरूण, २६. पूर्वाभाद्रपद का अजचरण, २७. उत्तराभाद्रपद का अहिर्बुध्न्य और २८. रेवती का पूषादेव स्वामी है।
नक्षत्रपादसंज्ञा
चू चे चो ला अश्विनी
ली
लू ले लो भरणी
आ
ई ऊ ए कृत्तिका
ओ
वा वी वू रोहिणी
वे वो का की मृगशीर्ष
कु
घ ङ छ आर्द्रा
के
को हा ही पुनर्वसु
हू
हे हो डा पुष्या
डी
डू डे डो आश्लेषा
मा
मी मू मे मघा
मो
टा टी ठू पूर्वाफाल्गुननि
टे
टो पा पी उत्तराफाल्गुननि
पू प ण ठ हस्ता
पे
पो रा री चित्रा
ती
तू ते तो विशाखा
ना
नी नू ने अनुराधा
नो
या यी यू ज्येष्ठा
ये
यो भा भी मूला
भू
धा फा ढा पूर्वाषाढा
भे
भो जा जी उत्तराषाढा
खी
खू खे खो श्रवण
जू जे जो ख अभिजित्
गा
गी गू गे धनिष्ठा
गो
सा सी सू गशतभिषा
से
सो दा दी पूर्वाभाद्रपद
दू
थ झ ञ उत्तराभाद्रपद
दे
दो चा ची रेवती
अधोमुखनक्षत्र
भरणी कृत्तिकाऽश्लेषा मघामूलविशाखिकाः।
तिस्रः पूर्वास्तथा चैव ह्यधोवक्राः प्रकीर्तिताः ।।
वापीकूपतडागादिखननं च तृणादिकम् ।
देवतागारखननं निधानखननं तथा ।।
गणितं ज्यौतिषारम्भं खनीबिलप्रवेशनम् ।
कुर्यादधोगतान्येव कार्याणि सर्वसिद्धये ।।
भरणी, कृत्तिका,आश्लेषा,मघा,मूल, विशाखा, पूर्वा फाल्गुनी, पूर्वाषाढा, और पूर्वाभाद्रपदा ये नक्षत्र अधोमुखी, (नीचे मुखवाले) है। ये नक्षत्र कुप, तालाब, मन्दिर धनभंडार खोदना, घास काटना, गणित और ज्योतिष का आरम्भ करना ,खान खोदाना, गुफा में प्रवेश करना आदि कार्यों में शुभ हैं।
ऊर्ध्वमुखनक्षत्र
रोहिण्यार्द्रा तथा पुष्यो धनिष्ठा चोत्तरात्रयम् ।
वारुणं श्रवणं चैव नव चोर्ध्वमुखाः स्मृताः ।।
एषु राज्याभिषेकं च पट्टबन्धं च कारयेत् ।
ऊर्ध्वमुखान्युच्छ्रितानि सर्वकार्याणि साधयेत् ।।
रोहिणी, आर्द्रा, पुष्य, धनिष्ठा, उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढा, उत्तराभाद्रपदा, शतभिषा, और श्रवण, ये नौ नक्षत्र ऊर्ध्वमुख (ऊपर मुखवाले) है । इन नक्षत्रो में राज्याभिषेक करना किला बाँधना इत्यादि उँचे कार्य करना श्रेष्ठ है।
तिर्यङ्मुखनक्षत्र
रेवती चाश्विनी चित्रा स्वाती हस्तः पुनर्वसुः।
अनुराधा मृगो ज्येष्ठा चेताः पार्श्वमुखाः स्मृताः ।।
गजोष्ट्राश्वबलीवर्ददमनं महिषस्य च ।
बीजानां वपनं कुर्याद्गमनागमनादिकम् ।।
चक्रयन्त्ररथादीनां नावादीनां प्रवाहणम् ।
पार्श्वेषु यानि कर्माणि कुर्यादेतेषु तानि च ।।
(बा.बो.ज्यो.)
रेवती, अश्विनी, चित्रा, स्वाति, हस्त, पुनर्वसु, अनुराधा, मृगशीर्ष और ज्येष्ठा ये नौ नक्षत्र तिर्यङ्मुख हैं । इन नक्षत्रों में हाथी, घोडा, ऊँट, बैल और भैंस इनको वश में करना चाहिए। बीज बोना, आने जाने का काम करना, चक्र, कोल्हु, रथ, गाडी, नाव आदि चलाना श्रेष्ठ है।
स्थिर ध्रुव नक्षत्र संज्ञा
उत्तरात्रयरोहिण्यो भास्करच ध्रुवं स्थिरम् ।
तत्र स्थिरं बीजगेहशान्त्यारामादिसिद्धये ।।
(मु.चि. न. प्र. श्लो. २)
रोहिणी, उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढा, उत्तराभाद्रपद, रविवार व ध्रुव-स्थिर संज्ञावाले नक्षत्रों में देवालय एवं नये घर में प्रवेश, नया गाँव बसाना, राज्याभिषेक और नया बगीचा बनाना आदि स्थिर कार्य करने चाहिए।
चरसंज्ञकनक्षत्र
स्वात्यादित्ये श्रुतेस्त्रीणि चन्द्रश्चापि चरं चलम् ।
तस्मिन्गजादिकारोहो वाटिकागमनादिकम् ।।
(मु.चि. न. प्र. श्लो. ३)
स्वाति, पुनर्वसु, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, सोमवार चर संज्ञावाले व नक्षत्रों में हाथी, घोडा, ऊँट आदि सवारी, नवीन फुलवाडी में जाना इत्यादि
चलायमान कार्य करना चाहिए।
उग्रसंज्ञकनक्षत्र
पूर्वात्रयं याभ्यमघे उग्रं क्रूरं कुजस्तथा ।
तस्मिन्धाताग्निशाठ्यानि विषशस्त्रादि सिद्ध्यति ।।
(मु.चि. न. प्र. श्लो. ४)
पूर्वाफाल्गुनी, पूर्वाषाढा, पूर्वाभाद्रपदा, भरणी, मघा मंगलवार व उग्र और क्रूर संज्ञावाले नक्षत्र,शत्रुका नाश, शत्रु के घर को जलाना और विष का कार्य, हथियार से कोई भी कार्य
करना इत्यादि
क्रूर कार्य
को करने के लिए शुभ हैं।
मिश्रसंज्ञकनक्षत्र
विशाखाग्नेयमे सौम्ये मिश्रं साधारणं स्मृतम् ।
तत्राग्निकार्यं मिश्रं च वृषोत्सर्गादि सिद्ध्यति ।।
(मु.चि. न. प्र. श्लो. ५)
विशाखा, कृत्तिका बुधवार व मिश्र अथवा साधारण संज्ञावाले नक्षत्रों में अग्नि संबंधी कोई भी काम करना अधिक चीजों को इकठ्ठा करना और वृषोत्सर्ग आदि कार्य करना चाहिए।
लघु क्षिप्रसंज्ञकनक्षत्र
हस्ताश्चिपुष्याभिजितः क्षिप्रं लघु गुरुस्तथा ।
तस्मिन्पण्यरतिज्ञानभूषाशिल्पकलदिकम् ।।
(मु.चि. न. प्र. श्लो. ६)
हस्त, अश्विनी, पुष्य,अभिजित् गुरुवार लघु और क्षिप्रसंज्ञावाले नक्षत्रों में नया व्यापार करना, काम, भोगविलास करना, नया गहना पहनना अथवा बनाना, कोई विद्या सीखना, चित्र का काम इत्यादी करना शुभ है।
मृदु-मैत्रसंज्ञकनक्षत्र
मृगान्त्यचित्रा मित्रर्क्षं मृदु मैत्रं भृगुस्तथा।
तत्र गीताम्बरक्रीडा मित्रकार्यं विभूषणम् ।।
(मु.चि. न. प्र. श्लो. ७)
मृगशीर्ष, चित्रा, अनुराधा, रेवती शुक्रवार मृदुमैत्र संज्ञावाले नक्षत्रों में गाना,
नये वस्त्रादि पहनना, क्रीडा करना और मित्र सम्बन्धी कोई काम करना चाहिये।
तीक्ष्ण-दारुणसंज्ञकनक्षत्र
मूलेन्द्रार्दाहिमं सौरिस्तीक्ष्णं दारुणसंज्ञकम् ।
तत्राभिचारघातोग्रभेदाः पशुदमादिकम् ।।
(मु.चि. न. प्र. श्लो. ८)
मूल, ज्येष्ठा, आर्द्रा, आश्लेषा (शनिवार) तीक्ष्ण-दारुण संज्ञावाले नक्षत्रों में मन्त्र सिद्धि से किसी को मारना, कोई भी क्रूर कर्म करना और पशुओं को वश में करना
इत्यादि अच्छा है।
गण्डान्त
गण्डान्तेन्द्रभशूलपातपरिघव्याघातगण्डावमे
सङक्रान्तिव्यतिपातवैधृतिसिनीवालीकुहूदर्शके।
(मु.चि.
न. प्र.
श्लो. ५७)
मूल को शास्त्रों में गण्डान्त की संज्ञा प्रदान की गई है। यह एक संस्कृत भाषा का शब्द है। गण्डान्त का नाम सन्धिकाल है। जैसे दिन-रात की सन्धि होती है ऎसे ही तिथि, लग्न व नक्षत्र की सन्धि होती है इनका कुछ भाग गण्डान्त कहलाता है। मूलत: आश्लेषा, मघा, ज्येष्ठा, मूल, रेवती व अश्विनी यह छः नक्षत्र गण्डमूल कहे जाते हैं। इनमें चरण विशेष में जन्म होने पर भिन्न-भिन्न फल प्राप्त होते है। इन नक्षत्र चरणों में यदि किसी जातक का जन्म हुआ हो तो, जन्म से २७वें दिन में जब पुनः वही नक्षत्र आ जाता है तब विधि विधान पूर्वक पूजन एवं हवनादि के माध्यम से इनकी शान्ति कराई जाती है।
नक्षत्र गण्डान्त -
इसी प्रकार रेवती और अश्विनी की संधि पर,
आश्लेषा और मघा की संधि पर और ज्येष्ठा और मूल की संधि पर ४
घड़ी मिलाकर नक्षत्र गंडांत कहलाता है। इसी तरह से लग्न गंडांत होता है। रेवती,
ज्येष्ठा व अश्लेषा नक्षत्र की अन्त की दो दो घटियां अर्थात ४८
मिनट अश्विनी,
मघा व मूल नक्षत्र के प्रारम्भ की दो दो घटियां,
नक्षत्र गण्डान्त कहलाती है।
Dr. Ashish J.
Assistant Professor,
Dept. of Vedang-Jyotish
Kavikulaguru Kalidas
Sanskrit university,
Ramtek,
Maharashtra-441106.
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