भारतीय कालमान का सामान्य परिचय ।
सृष्टि की उत्पत्ति
पर भारतीय संस्कृति के अनुसार वैदिक कल से ही ऋषियों द्वारा मत व्यक्त किये जाते
रहे थे ऋग्वेद के नासदीय सूक्त में ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति के बारे में
विस्तारपूर्वक चर्चा की गई है । ब्रह्माण्ड की पहले की स्थिति के बारे में निम्न
प्रकार वर्णन मिलता है ।
नासदासिन्नो सदासीत्तदानी नासीद्र्जो ना व्योमो परो यत ।
किमावरीव: कुह कस्य शर्मन्नम्भ: किमासिद गहन गभीरम ….तै. ब्रा. २/८/९
सृष्टि से पहले सत नहीं था/ असत भी
नहीं/अन्तरिक्ष भी नहीं / आकाश भी नहीं था / छिपा था क्या ? कहाँ /किसने ढका था?
/ उस पल तो/ अगम अतल जल भी कहाँ था?
चेतना ने एक से अनेक होते हुए ब्रह्माण्ड की रचना की । संसार में
भिन्न-भिन्न प्रकार के जीव जन्तु व वस्तु चारो ओर दिखाई देते है किन्तु वे सभी
मूलतः चेतना के ही रूप है । यही विश्वास अव्दैत कहलाता है ।
सृष्टि
की उत्पत्ति और विकास कैसे हुआ ? यदि हम सृष्टि में चारो ओर अपनी
दृष्टि डाले तो हम पाते है कि हर वस्तु एक बीज से शुरू होती है । धीरे-धीरे उसका
विकास होता है। विकसित होकर अपने चरम पर पहुँचती है तथा अन्त में अगले चक्र के
लिये बीज बनाकर नष्ट हो जाती है। यही सम्पूर्ण सृष्टि का नियम है।
यह
माना जाता है कि परमाणु की भाँति ही ब्रह्माण्ड का निर्मण होता रहता है तथा
प्रत्येक कार्य के पीछे कोई न कोई कारण छिपा रहता है। यदि कारण सूक्ष्म होता है तो
दिखाई नहीं दे पाता है। महर्षि कपिल के अनुसार नाश: कारणालयः अर्थात किसी का नाश
होने का अर्थ उसका अपने कारण में मिल जाना है। मनुष्य का मरना उसका पंचतत्व में
मिलना है जो जीवन में उसके जीने के कारण बन रहे होते है । इस तथ्य की पृष्टि रसायन
शास्त्र एवं भौतिक शास्त्र भी करते है । जिस प्रकार बीज को वृक्ष बनने में भूमि के
अन्दर कुछ इन्तजार करना पड़ता है है ठीक उसी प्रकार ब्रह्माण्ड भी कुछ समय के लिए
बिना अभिव्यक्ति के विकास में मार्ग पर सूक्ष्म रूप में रहकर कार्य करता है। यह
प्रलय या सृष्टि से पूर्व की अवस्था कहलाती है। जगत के कुछ समय तक सूक्ष्म रूप में
रहकर प्रकट होने का समय एक कल्प कहलाता है। ब्रह्माण्ड इस प्रकार के कई कल्पो से
चला आ रहा है। सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड से लेकर उसकी परिसीमा में आने वाले परमाणु तक
सभी वस्तुएँ इसी तरह तरंगीय स्वरूप में सभी दिशाओं में चलती रहती है । सृष्टि
रचनावाद उपरोक्त भारतीय विचार के अनुरूप है। भौतिकवादियों की इसी विचारधारा कि
बुद्धि ही सृष्टिक्रम का चरम विकास है।
सौर मंडल में सूर्य और वह खगोलीय पिंड सम्मलित
हैं, जो इस मंडल में एक दूसरे से गुरुत्वाकर्षण बल द्वारा बंधे हैं। किसी तारे के इर्द गिर्द
परिक्रमा करते हुई उन खगोलीय वस्तुओं के समूह को ग्रहीय मण्डल कहा जाता है जो अन्य तारे न हों, जैसे की ग्रह, बौने ग्रह, प्राकृतिक उपग्रह, क्षुद्रग्रह, उल्का, धूमकेतु और खगोलीय धूल। हमारे सूरज और उसके ग्रहीय
मण्डल को मिलाकर हमारा सौर मण्डल बनता है। इन पिंडों में आठ ग्रह, उनके 172 ज्ञात उपग्रह, पाँच बौने ग्रह और
अरबों छोटे पिंड शामिल हैं। इन छोटे पिंडों में क्षुद्रग्रह, बर्फ़ीला काइपर घेरा के
पिंड, धूमकेतु, उल्कायें और ग्रहों के
बीच की धूल शामिल हैं।
सुर्यसिध्दांत यह वेदांग का एक भाग है।
भारतीय ज्योतिषशास्त्र के त्रिस्क्ंद में से एक प्राचीन सिध्दांत ग्रंथ के रूपमें
इसे विशेष मान्यता प्राप्त है। क्रांतीवृत्त यह विषुववृत्त से थोडा तिरछा होने के
कारण प्रत्येक राशि का उदय काल भिन्न् भिन्न् होता है। प्राचीन समय की मान्यता
अनुसार लंका यह विषुववृत्तपर है ऐसा मानकर महर्षियोंने पलभा द्वारा प्राप्त राशियों
के उदयमान पलों को लंकोदय पल कहा है।
वेदाङ्ग हिन्दू धर्म ग्रन्थ हैं। वेदार्थ ज्ञान में सहायक शास्त्र को ही वेदांग कहा जाता है। शिक्षा, कल्प, व्याकरण,
ज्योतिष, छन्द और निरूक्त - ये छः वेदांग है
शिक्षा - इसमें
वेद मन्त्रों के उच्चारण करने की विधि बताई गई है। स्वर एवं वर्ण आदि के
उच्चारण-प्रकार की जहाँ शिक्षा दी जाती हो, उसे शिक्षा
कहाजाता है। इसका मुख्य उद्येश्य वेदमन्त्रों के अविकल यथास्थिति विशुद्ध उच्चारण
किये जाने का है। शिक्षा का उद्भव और विकास वैदिक मन्त्रों के शुद्ध उच्चारण और
उनके द्वारा उनकी रक्षा के उदेश्य से हुआ है।
कल्प - वेदों के किस
मन्त्र का प्रयोग किस कर्म में करना चाहिये, इसका कथन किया
गया है। इसकी तीन शाखायें हैं- श्रौतसूत्र, गृह्यसूत्र और धर्मसूत्र। कल्प
वेद-प्रतिपादित कर्मों का भलीभाँति विचार प्रस्तुत करने वाला शास्त्र है। इसमें
यज्ञ सम्बन्धी नियम दिये गये हैं।
व्याकरण - इससे
प्रकृति और प्रत्यय आदि के योग से शब्दों की सिद्धि और उदात्त, अनुदात्त तथा स्वरित स्वरों की स्थिति का बोध होता है। वेद-शास्त्रों का
प्रयोजन जानने तथा शब्दों का यथार्थ ज्ञान हो सके अतः इसका अध्ययन आवश्यक होता है।
इस सम्बन्ध में पाणिनीय व्याकरण ही वेदांग का प्रतिनिधित्व करता है। व्याकरण वेदों
का मुख भी कहा जाता है।
निरुक्त - वेदों में
जिन शब्दों का प्रयोग जिन-जिन अर्थों में किया गया है, उनके
उन-उन अर्थों का निश्चयात्मक रूप से उल्लेख निरूक्त में किया गया है। इसे वेद
पुरुष का कान कहा गया है। निःशेषरूप से जो कथित हो, वह
निरुक्त है। इसे वेद की आत्मा भी कहा गया है।
ज्योतिष - इससे
वैदिक यज्ञों और अनुष्ठानों का समय ज्ञात होता है। यहाँ ज्योतिष से मतलब `वेदांग ज्योतिष´ से है। यह वेद पुरुष का नेत्र माना जाता है। वेद यज्ञकर्म में प्रवृत होते हैं और यज्ञ काल
के आश्रित होते है तथा जयोतिष शास्त्र से काल का ज्ञान होता है। अनेक वेदिक
पहेलियों का भी ज्ञान बिना ज्योतिष के नहीं हो सकता।
छन्द - वेदों में प्रयुक्त गायत्री, उष्णिक आदि
छन्दों की रचना का ज्ञान छन्दशास्त्र से
होता है। इसे वेद पुरुष का पैर कहा गया है। ये छन्द वेदों के आवरण है। छन्द
नियताक्षर वाले होते हैं। इसका उदेश्य वैदिक मन्त्रों के समुचित पाठ की सुरक्षा भी
है।
छन्द को वेदों का
पाद,
कल्प को हाथ, ज्योतिष को नेत्र, निरुक्त को कान, शिक्षा को नाक, व्याकरण को मुख कहा गया है।
छन्दः
पादौ तु वेदस्य हस्तौ कल्पोऽथ पठ्यते
ज्योतिषामयनं
चक्षुर्निरुक्तं श्रोत्रमुच्यते।
शिक्षा
घ्राणं तु वेदस्य मुखं व्याकरणं स्मृतम्
तस्मात्सांगमधीत्यैव
ब्रह्मलोके महीयते॥
तेजोमय
ब्रह्म ही सबका बीज है, उसी से यह सम्पूर्ण जगत
उत्पन्न हुआ है। उस एक ही ब्रह्म से स्थावर और जगंम दोनों की उत्पत्ति होती
है। पहले कह आये हैं, ब्रह्मा जी अपने दिन
के आरम्भ में जागकर अविद्या (त्रिगुणात्मि का प्रकृति के) द्वारा सम्पूर्ण जगत
की सृष्टि करते हैं। सबसे पहले महत्त्व प्रकट होता है। उससे स्थूल सृष्टि का
आधारभूत मन उत्पन्न होता है। उन मन की दूर तक गति है तथा वह अनेक प्रकारसे
गमनागमन करता है। प्रार्थना और संशयवृत्तिशाली वह मन चैतन्य से संयुक्त होकर सम्पूर्ण
पदार्थों को अभिभूत करके सात मानस ऋषियों की सृष्टि करता है। फिर सृष्टि की इच्छा
से प्रेरित होने पर मन नाना प्रकार की सृष्टि करता है। उससे आकाश की उत्पत्ति होती
है। आकाश का गुण ‘शब्द’ माना गया है। तत्पश्चात जब आकाश में विकार होता है,
तब उससे पवित्र और सम्पूर्ण गन्धों को वहन करने वाले बलवान
वायुतत्व का आविर्भाव होता है। उसका गुण ‘स्पर्श’ माना गया है। फिर वायु में भी
विकार होता है और उससे प्रकाशपूर्ण अग्नि-तत्व प्रकट होता है। वह अग्नि तत्व चमचमाता
हुआ एवं दीप्तिमान है। उसका गुण ‘रूप’ बताया जाता है।
सांख्य में प्रकृति पुरुष विवेक से मोक्ष
(नि:श्रेयस) की प्राप्ति स्वीकृत है । सांख्य में 25 तत्वों
की स्वीकार्यता है । इन 25 तत्वों में कुछ तो प्रकृति
(कारण) हैं, कुछ प्रकृति-विकृति (कारण-कार्य) हैं, कुछ केवल विकृति (कार्य) हैं तथा कुछ न तो कारण हैं न ही कार्य हैं । इनका
विवरण संक्षेप में नीचे दिया जा रहा है ।
मूल
प्रकृति (केवल कारण) महत् (बुद्धि), अहंकार, पंचतन्मात्राएँ (कारण भी और कार्य भी)
एकादशेन्द्रियाँ, पंचमहाभूत (केवल कार्य)
पुरुष (न कार्य न ही कारण)
इनमें किसकी उत्पत्ति
किससे होती है संक्षेप में जान लें प्रकृति मूल है,
इसकी किसी से उत्पत्ति नहीं होती है, यह
सार्वभौमिक व सार्वकालिक है । इसलिये यह केवल उत्पादक है, स्वयं
उत्पन्न होने वाली नहीं । शेष क्रम निम्न है - प्रकृति से महत् (बुद्धि)
बुद्धि से अहंकार अहंकार से पंचतन्मात्राएँ (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध) व एकादश इन्द्रियाँ (पंचज्ञानेन्द्रियाँ - कान,
त्वचा, आंख, जिह्वा तथा
नाक, पंचकर्मेन्द्रियाँ - वाक्, पाद,
पाणि, पायु, उपस्थ,
एक उभयेन्द्रिय - मन) । पंचतन्मात्राओं से
पंचमहाभूत (शब्द - आकाश, स्पर्श - वायु, रूप - अग्नि, रस - जल, गन्ध -
पृथ्वी) पुरुष (न उत्पादक न ही उत्पाद्य)।
काल
शब्द 'कल् संख्याने' सूत्रानुसार कल् धातु से निष्पत्र और
गणना के अर्थ में व्यवहारार्ह माना गया है। काल के विना एक तुच्छतम कार्य का भी
सम्पादन करना असम्भव है। इस तरह सर्वोपयोगी व सर्वसाधारण काल, जिसे नेत्र से देखा भी नहीं जा सकता और जिसका प्रत्यक्षीकरण मात्र कार्य
से ही सम्भव होता है। वस्तुतः संसार के सभी कार्य काल की अपेक्षा रखता है। इस
प्रकार यह स्पष्ट है कि इस संसार में क्रिया की अपेक्षा काल निश्चय ही महत्त्वपूर्ण
है। वह काल सर्वव्यापक व नित्य है, जिसमें ही अखिल
ब्रह्माण्ड स्थित है। वह काल ही इस व्यापक ब्रह्माण्ड का सञ्चालक होने से उसका
ईश्वर-परमेश्वर है, यह स्पष्ट हो जाता है। इस काल के प्रसङ्ग
को भारतीय वैदिक साहित्य व दर्शन में अनेक स्वरूपों में प्रतिपादित व विवेचित किया
गया है। उसमें उसके दो स्वरूप स्पष्ट परिलक्षित होते है। एक सृष्टि सञ्चालक,
पालक व संहारक के रूप में और दूसरा गणनात्मक या कलनात्मक रूप में।
यहाँ उस काल के दूसरे स्वरूप के व्यावहारिक पक्ष की विशद चर्चा करना उद्देश्य है।
कल्प हिन्दू समय चक्र की बहुत लम्बी मापन इकाई है। मानव वर्ष गणित के अनुसार
३६० दिन का एक दिव्य अहोरात्र होता है। इसी हिसाब से दिव्य १२००० वर्ष का एक
चतुर्युगी होता है। ७१ चतुर्युगी का एक मन्वन्तर होता है और १४ मन्वन्तर/
१०००चतुरयुगी का एक कल्प होता है। यह शब्द का अति प्राचीन वैदिक हिन्दू ग्रन्थों
में उल्लेख मिलता है। यह बौद्ध ग्रन्थों में भी मिलता है, हालाँकि
बहुत बाद के काल में, वह भी हिन्दू वैदिक धर्म ग्रन्थ से
लिया हुआ ही है। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि बुद्ध एक हिन्दू परिवार में
जन्में हिन्दू ही थे जिनके
लगभग ५०० वर्ष पश्चात् उनके अनुयायी राजकुमार सिद्धार्थ जो बोध ग्यान के बाद गौतम
बुद्ध नाम से प्रसिद्ध हुए।
सृष्टिक्रम
और विकास की गणना के लिए कल्प हिन्दुओं का एक परम प्रसिद्ध मापदंड है। जैसे मानव
की साधारण आयु सौ वर्ष है, वैसे ही सृष्टिकर्ता ब्रह्मा की भी आयु
सौ वर्ष मानी गई है, परंतु दोनों गणनाओं में बड़ा अन्तर है।
ब्रह्मा का एक दिन 'कल्प' कहलाता
है, उसके बाद प्रलय होता है। प्रलय
ब्रह्मा की एक रात है जिसके पश्चात् फिर नई सृष्टि होती है।
चारों
युगों के एक चक्कर को चतुर्युगी अथवा पर्याय कहते हैं। १‚००० चतुर्युगी अथवा
पर्यायों का एक कल्प होता है। ब्रह्मा के एक मास में तीस कल्प होते हैं जिनके
अलग-अलग नाम हैं, जैसे श्वेतवाराह कल्प, नीललोहित कल्प आदि। प्रत्येक कल्प के १४ भाग होते हैं और इन भागों को 'मन्वंतर' कहते हैं।
प्रत्येक मन्वंतर का एक मनु होता है, इस
प्रकार स्वायंभुव, स्वारोचिष् आदि १४ मनु हैं। प्रत्येक
मन्वंतर के अलग-अलग सप्तर्षि, इद्रं तथा इंद्राणी आदि भी हुआ
करते हैं। इस प्रकार ब्रह्मा के आज तक ५० वर्ष व्यतीत हो चुके हैं, ५१वें वर्ष का प्रथम कल्प अर्थात् श्वेतवाराह कल्प प्रारंभ हुआ है।
वर्तमान मनु का नाम 'वैवस्वत मनु' है
और इनके २७ चतुर्युगी बीत चुके हैं, २८ वें चतुर्युगी के भी
तीन युग समाप्त हो गए हैं, चौथे अर्थात् कलियुग का प्रथम
चरण चल रहा है।
युगों की अवधि इस प्रकार है - सत्युग १७,२८,००० वर्ष; त्रेता १२,९६,००० वर्ष; द्वापर ८,६४,००० वर्ष और कलियुग ४,३२,००० वर्ष। अतएव एक कल्प १००० चतुर्युगों के बराबर
यानी चार अरब बत्तीस करोड़ (4,32,00,00,000) मानव वर्ष का
हुआ।
An Article by
Dr. Ambalika Sethiya, KKSU.
साधु । सम्यक् अस्ति ।
ReplyDeleteVed and Vedang are Sanathan Dharm kaa grandh hai. Hindu dharm kehanaa.... !!!!???
ReplyDeleteArticle can be further improved covering more about TIME basically....