अक्षय तृतीया का महत्त्व
अक्षय तृतीया का महत्त्व
लोकाभिरामं रणरङ्गधीरं राजीवनेत्रं रघुवंशनाथम् ।
कारुण्यरुपं
करुणाकरंतं श्रीरामचंद्रं शरणं प्रपद्ये ॥
वैशाख मास की शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि अक्षय तृतीया कहलाती है।
न क्षयः अक्षयः
माना जाता है कि, इस दिन किए गए जप, तप, स्नान, दान पुण्यकर्मादि
के फल में क्षय अर्थात न्यूनता न होकर वह अक्षय हो जाते हैं। ज्योतिष शास्त्र की दृष्टी से भी अक्षय तृतीया का
दिन विशेष माना जाता है, क्योंकी इस दिन सूर्य और चंद्र
दोनों अपनी उच्चराशि क्रमशः मेष और वृषभ राशि में होते है।
इस दिन रोहिणी नक्षत्र का होना अत्यंत शुभ माना जाता
है।
वैशाखे शुक्लपक्ष तृतीया रोहिणीयुता।।
दुर्लभा बुधवारेण सोमेनापि
युता तथा।।
अक्षय तृतीया के दिन रोहिणी नक्षत्र यदि बुधवार या
सोमवार के साथ रहे तो वह विशेष योग बनाता है। ऐसा कथन निर्णयामृत
ग्रंथ में प्राप्त होता ह।
रोहिणी नक्षत्र को ज्योतिष शास्त्र में स्थिर
नक्षत्र की संज्ञा प्राप्त है। साथ ही धनसंचय अलङ्कारादि
क्रय इत्यादी रोहिणी नक्षत्र संबंधित कार्य है।
जैसा कि कहा गया है मुहूर्तगणपति ग्रन्थ में -
रोहिण्यां
पौष्टिकं कुर्याद् विवाहं धनसङ्ग्रहम्।
प्रासादं सुरकृत्यं च माङ्गल्यं भूषणादिकम् ।।
अतः अक्षय तृतीया के दिन भूमिक्रय, धनसंचय (स्वर्णादिक्रय) स्वर्ण आभूषणों
का क्रय,वाहनक्रय आदि कार्य किए जाते है।
साथ हि प्रकृति में भी इस काल में परिवर्तन दिखाई
देता है, वसंत समाप्त होकर ग्रीष्म काल प्रारंभ होता दिखाई
देता है अतः ग्रीष्म काल में उपयोगी जलकुम्भ (घट) ग्रीष्मऋतु के फल आम्रफल इत्यादी का दान इस दिन किया जाता है।
पुराणादी के अनुसार अक्षयतृतीया के दिन ही भगवान
विष्णु के छठे अवतार भगवान श्री परशुराम का अवतार भी हुआ था अतः समस्त भारत में इस
दिन परशुराम जयंती का उत्सव भी अत्यंत हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। बहुत्र
अक्षय तृतीया को ही आखा तीज के नाम से भी जाना जाता है। ठीक उसी प्रकार भारत के विभिन्न प्रान्तों में इस दिन का अपना एक विशेष
महत्त्व है ।
!!धन्यवाद!!
श्री.अनुज प्रदीप शर्मा
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