तिथि विचार

 

तिथि विचार


 

                                                        Shri. Anuj Pradeep Sharma

Research Scholar

 KKSU, Ramtek

  anujs@kksu.org

 

 


पञ्चाङ्ग के पाँच अङ्गों में से प्रथम अङ्ग है तिथि। दैनिक जीवन में प्रयोग होने वाले शब्द दिनाङ्क के स्थान पर भी तिथि शब्द का प्रयोग किया जा सकता है। कालविधानशास्त्र के अनुसार सूर्य और चन्द्र के गति का अन्तर ही एक तिथि कहलाता है। एक मास में दो पक्ष होते है कृष्ण पक्ष एवं शुक्ल पक्ष इन दोनों ही पक्षों में पंद्रह-पंद्रह तिथियाँ होती है। प्रतिपदा, द्वितीया, तृतीया, चतुर्थी, पञ्चमी, षष्ठी, सप्तमी, अष्टमी, नवमी, दशमी, एकादशी, द्वादशी, त्रयोदशी, चतुर्दशी, अमावस्या एवं पूर्णिमा। कृष्ण पक्ष की पंद्रहवी तिथि अमावस्या कहलाती है तो वही शुक्ल पक्ष की पंद्रहवी तिथि पूर्णिमा कहलाती है।

मुहूर्तादि ग्रन्थों में इन तिथियों के स्वामी या अधिपतियों का वर्णन प्राप्त होता है।

तिथीशा वह्निकौ गौरी गणेशोऽहिर्गुहो रविः।

शिवो दुर्गान्तको विश्वे हरिः कामः शिवः शशी॥

(मुहूर्तचिन्तामणि १/३)


तिथि स्वामी

प्रतिपदा – अग्नि, द्वितीया - ब्रह्मा, तृतीया - गौरी, चतुर्थी - गणेश, पञ्चमी - नाग, षष्ठी – स्कंद (कार्तिकेय), सप्तमी - सूर्य, अष्टमी - शिव, नवमी - दुर्गा, दशमी - यमराज, एकादशी - विश्वेदेव, द्वादशी – हरि (विष्णु), त्रयोदशी – कामदेव, चतुर्दशी - शिव, अमावस्या – शशी, पूर्णिमा - चन्द्रमा ।

तिथियों के स्वामी का प्रयोजन है उनके व्रत-पूजनादि से अर्थात् जिस तिथि के जो देवता बताए गए है उसी तिथि में उनका पूजनादि करना उचित है। जैसा कि अग्निपुराण में भी कहा गया है –

प्रतिपद्यग्निपूजा स्याद् द्वितीयायां चा वेधसः।

दशाम्यामन्तकस्यापि षष्ठ्यां पूजा गुहस्य च॥

चतुर्थ्यां गणनाथस्य गौर्यास्तत्पूर्ववासरे।

सरस्वत्या नवम्यां च सप्तम्यां भास्करस्य च॥

अष्टम्यांञ्च चतुर्दश्यामेकादश्यां शिवस्य च।

द्वादश्यां च त्रयोदश्यां हरेश्च मदनस्य च॥

शेषादीनां फणीशानां पञ्चम्यां पूजनं भवेत्।

पर्वणीन्दोस्तिथिष्वासु पक्षद्वयगतास्वपि॥

भारतवर्ष में मनाए जाने वाले प्रायः सभी व्रत-उत्सवादि तिथियों के आधार पर ही मनाए जाते है। जैसे की बलिप्रतिपदा, यमद्वितीया, काजल तीज, गणेश चतुर्थी, करवा चौथ, नाग पञ्चमी, स्कंद षष्ठी, रथ सप्तमी, भैरव अष्टमी, राम नवमी, विजया दशमी, वैकुण्ठ एकादशी, गोवत्स द्वादशी, धन त्रयोदशी, नरक चतुर्दश, हरीयाली अमावस्या, गुरु पूर्णिमा इत्यादि। इसी प्रकार इन तिथियों की पाँच संज्ञाए शास्त्रों में बताई गई है।

नन्दा च भद्रा च जया च रिक्ता पूर्णेति तिथ्योऽशुभमध्यशस्ताः।

सितेऽसिते शस्तसमाधमाः स्युः सितज्ञभौमार्किगुरौ च सिद्धाः॥ 

(मुहूर्तचिन्तामणि १/४)

 



तिथि संज्ञा

नन्दा, भद्रा, जया, रिक्ता, पूर्णा यह क्रम से तिथियों की संज्ञा है।

 

नन्दा- प्रतिपदा, षष्ठी, एकादशी

भद्रा- द्वितीया, सप्तमी, द्वादशी

जया- तृतीया, अष्टमी, त्रयोदशी

रिक्ता- चतुर्थी, नवमी, चतुर्दशी

            पूर्णा- पञ्चमी, दशमी, अमावस्या, पूर्णिमा

 

जैसा इन तिथियों का नाम है उसी प्रकार यह तिथियाँ फल भी प्रदान करती है। इन तिथियों में से रिक्ता संज्ञक तिथियों को मुहूर्तादि में अशुभ माना गया है उसके अतिरिक्त अन्य तिथियाँ शुभ है। अमावस्या सर्वत्र शुभ नही है। तो इन तिथियों का हमारे दैनिक जीवन में अत्यंत ही महत्त्व है, साथ ही मुहूर्तादि में तिथियों का विशेष स्थान है।

!! धन्यवाद !!


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