वैदिक ज्योमेट्री (वैदिक काल में भूमिती /Geometry)

डॉअंबालिका सेठिया

सहायक प्राध्यापक

वेदांग ज्योतिष विभाग

    कुछ दिनों पहले Whats app पर कुछ पढकर वैदिक ज्योमेट्री (वैदिक काल में भूमिती/ Geometry) इस विषय पर लिखने का मन हुआ, Whats app के उस लेख में  राजस्थान के एक कुएं का चित्र था और नीचे लिखा था कि, Built 1000+ years ago in the Abhaneri village of Rajasthan. 64 ft deep,13 floors, And has 3,500 narrow steps arranged in perfect symmetry! The Chand Baori is one of the largest stepwells in the World and also one of the most beautiful ones. Without knowledge of geometry, mathematics, physics, engineering, how is it possible ?

          यह पढकर शायद आपको हसीं आएगी या दु:ख हो सकता है, या थोडा गुस्सा ……. मेरे साथ यह सभी हुआ जब मैने, Without knowledge of geometry, mathematics, physics, engineering, how is it possible ? यह वाक्य पढा। हमारे पूर्वज इस विषयों से भलिभांति परिचित थे, वह इन विषयों की गहराइयों को कितने अच्छे से जानते थे यह बताना मेरा नैतिक कर्तव्य और उद्देश्य है, इसिलिए यह मेरा एक छोटा सा प्रयास है, शायद आपको भी पसंद आएगा….. तो आइए जानते हैं कुछ तथ्य

          वास्तव में ज्योमेट्री शब्द सुनते ही हम भागने लगते हैं, क्योंकि, हमें स्कूल में गणित के इस अध्याय ज्योमेट्री नें कुछ परेशान किया था। लेकिन यह इतना परेशान नहीं कर सकता यदि इसे वैदिक ज्योमेट्री के साथ हमें पढाया जाता।

          वैदिक काल में गुरु अपने शिष्य को इसे दैनिक कार्य करते-करते सरलता से सीखाया करते थे। यदि वैदिक कालीन ज्योमेट्री अच्छी थी तो फिर Pythagoras  के प्रमेय और Euclids के सिद्धान्त क्यों सीखाएं जाते हैं? क्यों कोई भारतीय गणितज्ञ का नाम किसी पुस्तक में नहीं होता?

          कहते हैं ना कि, ‘घर का जोगी जोगटा, पर गांव का सिद्ध महंतदूसरों को तो हमारी संस्कृती से ईष्या और जलन थी ही, लेकिन हमने खुद ने ही अपनी महानता को नहीं पहचाना। परंतु आज विदेशी लोग भी इस वैदिक गणित को सीख रहें हैं।

          आज हमारा भी उत्तरदायित्व बनता है, हमारी नैतिक जिम्मेदारी है, कि हम अपनी महान विरासत को पहचाने और हमारे जीवन में शामिल करें। और किसी दुष्प्रचार का शिकार ना बनें। दुष्प्रचार तो ऎसा भी किया जाता है, कि न हमारे यहां विमान शास्त्र था, न परमाणु विज्ञान था, न हमारे यहां आयुर्वेद था, न हमें गणित आता था, और न ही हमें ज्योमेट्री आती थी। तो फिर यह क्या है?



  



क्या ऎसी आकृतियां और ऎसे बडे-बडे स्थापत्य बिना गणित के और बिना ज्योमेट्री के क्या संभव हो सकते थे?  या इन्हे जादू से बनाया गया था? यह सब बनाने के लिये हमें उच्च कोटी का ज्ञान होना आवश्यक है, जो हमारे वैदिक ऋषि-मुनियों के पास था, और ज्योमेट्री को शुल्बसुत्र कहा जाता था। वैदिक काल में हमें ज्योमेट्री कई क्षेत्रों में देखने मिलती है, इनमें से पहला है कल्पशास्त्र अर्थात यज्ञ निर्माण कला जिसमें हमें ज्योमेट्री मिलती है, दूसरा है ज्योतिष विज्ञान इसमें भी हमें ज्योमेट्री देखने मिलती है, तीसरा है वास्तुशास्त्र और शिल्पशास्त्र यह भी ज्योमेट्री भरपूर है, और चौथा है श्रीविद्या|  इस श्रीविद्या में श्रीयंत्र का निर्माण ज्योमेट्री के द्वारा किया जाता था।

          तो आइये जानते हैं कैसी थी वैदिक कालीन ज्योमेट्री वैदिक काल में केवल ऋषि-मुनि ही नहीं, बल्कि ब्राह्मण कलाकार और कारीगर भी ज्योमेट्री में निष्णांत थे। और इनकी यह विद्वत्ता हमें कल्पशास्त्र में देखने मिलती है, कल्पशास्त्र यज्ञ का विज्ञान है, इस कल्पशास्त्र के दो विभाग है – पहला है . श्रोतसूत्र जिसमें यज्ञ में बोले जाने वाले मंत्रो का दिशानिर्देश है, जो अनुष्ठान में बहुत उपयोगी है और दूसरा है २. शुल्बसूत्र जिसमें यज्ञ और यज्ञवेदी के बारे में है, और यह ज्योमेट्री के लिये बहुत ही महत्वपूर्ण है।

          शुल्बसूत्र का अर्थ है, शुल्ब अर्थात रस्सी और सूत्रसिद्धान्त, नियम और यह सिध्दान्त यज्ञवेदी बनाने के लिये बहुत महत्वपूर्ण है। प्राचीन समय में नापने के लिये रस्सी का उपयोग किया जाता था। अग्नीवेदी में तीन वेदी होती है एक वर्गाकार, दूरसी वृत्ताकार और तीसरी अर्धवृत्ताकार। इस वेदी में सबसे अनोखी बात यह है की इनका आकार भले ही वर्गाकार, वृत्ताकार और अर्धवृत्ताकार है किंतु क्षेत्रफल एक समान होता है। बिना भूमिती के ज्ञान के एक समान क्षेत्रफलवाले आकार नहीं बनाएं जा सकते।

          प्राचीन समय में नाप लेने के लिये हमारे ऋषियों के पास एक खास ईकाई थी जिसे अंगुल कहते थे। तिल के ३४ दानों को एक सीधी रेखा में रखा जाता था और जितनी लंबाई बनती थी उसे एक अंगुल कहा जाता था। अंगुल ही माप लेने की Standard ईकाई थी। जिसे हम आज इंच कहते हैं वह भी १९९५ तक १ इंच अर्थात पैर के एक अंगुठे की चौडाई जितना माप होता था जिसे पूरा यूरोप मानता था। इससे भी पहले १ इंच अर्थात जौ के ३ दाने इतनी लंबाई होता था। इंच के मुकाबले तिल का माप Standard था क्योंकि तिल के दाने एक समान होते हैं। अभी नाप लेने के लिये Measuring tape आसानी से उपलब्ध है, किन्तु तब तिल के दानों से बनने वाले अंगुल नाप से ही माप लिया जाता था।


 

अब हम जानेंगे की प्राचीन काल में इन वेदी की रचना किस प्रकार से की गई । वैदिक काल में वर्ग अर्थात square कैसे बनाते थे प्राचीन समय में यज्ञ वेदी बनाने के लिये सर्वप्रथम दिशा का निर्धारण किया जाता था। दिशाओं का निर्धारण सूर्य को देखकर किया जा सकता है। किन्तु उत्तरायणदक्षिणायण और सूर्य संक्रांती के कारण सूर्य के उदित होने की दिशा में  थोडा अंतर अंतर आता है। अत: दिशा को निर्धारित करने के लिये एक शलाका अर्थात एक छडी/लकडी को लेते थे और उसे रस्सी से बांधकर, उस रस्सी का एक छोर खीले से बांधते थे और छडी के जमीन में गडाकर एक वर्तुल बनाते थे। और यह कार्य सूर्योदय से पहले होता था। सूर्योदय होने के उपरान्त उस छडी की परछाई सूर्य के विपरीत दिशा में पडती है, सूर्य जैसे जैसे ऊपर चढता है, छडी की परछाई भी अपना स्थान बदलती है और सूर्यास्त होने पर उसकी परछाई सूर्य के सामने पडती है। इस विधि से हमें दो बिंदू प्राप्त होते हैं, इन बिन्दुओं को रेखा के द्वारा जोडने से हमें पूर्व और पश्चिम दिशा प्राप्त होती है।

          इसके बाद वर्ग जितना बडा बनाना हो उतनी अंगुल की रस्सी लेकर उस पूर्व-पश्चिम रेखापर एक वर्तुल बनाकर, उस वर्तुल के मध्य से एक और वर्तुल बनाना है। फिर A और B के लंबवत दूसरा वर्तुल बनाना है। फिर B को केन्द्र में रखकर तीसरा वर्तुल बनाना है। और इसी प्रकार हमें ५ वां वर्तुल बनाना है। अब हमें इसमें चार बिंदु प्राप्त होगे उन्हें जोडने पर एक वर्ग अर्थात square मिल जाएगा। वह कुछ इस प्रकार से दिखता है। इससे प्राप्त वर्ग सटीक दिशाओं के साथ कोण भी ९० डिग्री के मिलेंगे। इसी तरह से वेदी और यज्ञकुण्ड बनाएं जाते थे।

          जैसा कि हमने पहले देखा कि, समान क्षेत्रफल किन्तु वर्गाकार, वर्तुलाकार और अर्धवर्तुलाकार वेदी होती थी तो यह कैसे बनाते थे अब हम जानेंगे सर्वप्रथम हमें १,,,४ बिंदुओं जोडकर वर्ग बनाना है, उसको घेरते हुए एक वृत्त बनाना है, फिर हमें X और Y जोडती हुई और O को चिन्हीत करती हुई एक रेखा बनानी है। अब X और Y के बीच एक समान तीन भाग करके Z को चिन्हीत करना है। अब X, Y तिहाई के रूप में है। Y,X एक तिहाई है पर Z,X दो तिहाई है। अब हमें O और Z बिंदु के साथ एक वर्तुल बनाना है। O और Z से बना वर्तुल बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इस वर्तुल का क्षेत्रफल वर्ग के क्षेत्रफल जितना ही है।

          इसी प्रकार शुल्बसूत्र में त्रिभुज, समलंब चतुर्भुज, चतुष्कोण, षटकोण, वृत्त, वर्ग, षट् कोण आदि विविध भौमितिक आकारों को बनाने की विधि, उनको बनाने के सूत्र दिए गए हैं। और इन्हीं सूत्रों द्वारा विविध आकार के यज्ञकुण्डों का निर्माण किया जाता था और छात्रों को सीखाया जाता था जिससे छात्र सरलता से भूमिती सीख जाते थे। यज्ञ कुण्डो के साथ-साथ यज्ञ वेदी भी बनाई जाती थी जैसे श्येनचित्ति, रथचक्र चित्ति, कूर्मचित्ति आदि।

          यज्ञ कुण्डो और यज्ञ वेदी का निर्माण करते करते छात्र पाई के बारे में भी जानकारी प्राप्त करते थे, Pythagoras  के प्रमेय भी सीख जाते थे। पाई एक गणितीय नियतांक है, जिससे हमारे ऋषि-मुनि भलीभांति परिचित थे। किसी वृत्त की परिधि उसके व्यास के अनुपात के बराबर होती है, जिसका मूल्य ३.१४१५९ के बराबर होता है।  यदि किसी वृत्त का व्यास एक अंगुल है तो उसके व्यास की परिधि पाई के बराबर अर्थात ३.१४१५९ के बराबर होगी।


          आर्यभटीय, गणितपाद सूत्र १० में आर्यभट कहते हैं, चतुराधिकं शतमष्टगुणं द्वाषष्टिस्तथा सहस्राणाम्। अयुतद्वयस्य विष्कम्भस्यासन्नो वृत्तपरिणाह:॥ अर्थात आर्यभट्ट के अनुसार पाई का मूल्य ३.१४१६ है और आधुनिक पाई का मूल्य ३.१४१५९ है,  आर्यभट्ट का पाई का मूल्य इतना सटीक है।

इसी प्रकार Pythagoras से पहले ही ऋषि बोधायन के समकोण त्रिकोण का सूत्र दिया था,

लम्बाई+ चौडाई= विकर्ण

+=

१६ + = २५

          एक आयत का विकर्ण उतना ही क्षेत्र इकठ्ठा बनाता है जितने की उसकी लम्बाई और चौडाई अलग-अलग बनाती है, यही Pythagoras का प्रमेय है । वस्तुत: इसे बोधायन पायथागोरस प्रमेय कहा जाना चाहिये।

          इस लेख के माध्यम के हमने देखा कि, हमारे ऋषि मुनि भूमिती /Geometry जानते थे, न केवल जानते थे बल्कि भरपूर मात्रा में ज्योमेट्री का उपयोग भी हुआ जिसके अनगिनत उदाहरण आज भी हमारे सामने है। गणित और भूमिती के सिद्धान्त उन्होंने पहले ही दे दिये थे। परंतु उन्हें उतनी प्रसिद्धि नहीं मिली जितनी पश्चिमी गणितज्ञों को मिली।

॥श्रीकृष्णार्पणमस्तु॥ १२ फ़रवरी २०२३

 

 

 



Comments

Popular posts from this blog

राराजतां संस्कृतम् (Imporance of Sanskrit Lanuage

वास्तुशास्त्र में प्रतिमा-मूर्ति कला विज्ञान

Gambling and its regulation: a History through Sanskrit Literature